जानलेवा इंसेफेलाइटिस : हर दिन होती है 17 से 18 बच्चों की मौत, जानें बचाव और लक्षण

 

 

गोरखपुर हादसे में जानलेवा बीमारी जापानी इनसेफेलाइटिस (जेई) या दिमागी बुखार का कहर फिर एक बार सामने आया है। गोरखपुर के बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में पिछले छह दिनों में अब तक 63 मरीजों की मौत हुई है जिसमें कई बच्चे इनसेफेलाइटिस की चपेट में थे। साल 1978 में भारत में पहली बार इस बीमारी का पता चला था और अब तक इस बीमारी से करीब 15,500 मौतें हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह के अनुसार, बीते तीन साल में हर दिन औसत 17 से 18 बच्चों की मौत होती है। ये मामले अगस्त के महीने में ज्यादा हो जाते हैं। 2016 के अगस्त महीने में 587 बच्चों की मौत हुई थी जबकि 2015 में 668 बच्चों का जीवन नहीं बच पाया।

 

क्या है यह बीमारी
हर साल जुलाई से लेकर दिसंबर तक काल बनने वाली यह बीमारी एक मादा मच्छर क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस के काटने से होती है। इसमें दिमाग के बाहरी आवरण यानी इन्सेफेलान में सूजन हो जाती है। कई तरह के वायरस के कारण ब्रेन में सूजन के कारण हो सकते हैं। कई बार बॉडी के खुद के इम्यून सिस्टम के ब्रेन टिश्यूज पर अटैक करने के कारण भी ब्रेन में सूजन आ सकती है। यह बीमारी सबसे पहले जापान में 1870 में सामने आई जिसके कारण इसे ‘जापानी इंसेफेलाइटिस’ कहा जाने लगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2014 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में विशेष तौर पर सुदूर पूर्व रूस और दक्षिण पूर्व एशिया में इस रोग के कारण प्रति वर्ष करीब 15 हजार लोग मारे जाते हैं।

लक्षण
इस बीमारी रोगी को तेज बुखार, झटके, कुछ भी निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण नजर आने लगते हैं। रोगी को सही समय पर और समुचित इलाज नहीं मिला तो तीन से सात दिन में मौत हो जाती है। इस बीमारी में पूरे शरीर में तेज दर्द होता है। कमर और गर्दन में अकड़न होती है। उल्टी, घबराहट, चक्कर, तेज बुखार जैसे समस्या सामने आती है।

सिर्फ मच्छर ही नहीं दूषित पानी भी जिम्मेदार
साल 2006 तक इनसेफेलाइटिस का जिम्मेदार सिर्फ मच्छरों को माना जाता था। उसके बाद कुछ शोधों से पता चला कि सभी मामले दिमागी बुखार के नहीं थे। कई मामलों में वहां जलजनित एंटेरो वायरस की मौजूदगी पाई गई। वैज्ञानिकों ने इसे एईएस यानि एक्यूट इनसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का नाम दिया। पूर्वांचल में कुछ समय में दिमागी बुखार के मामलों में तो कमी आई है, लेकिन एईएस के मामले बढ़े हैं। इस बीमारी के लक्षण भी दिमागी बुखार जैसे ही होते हैं।

2006 में शुरू हुआ टीकाकरण
साल 2006 में पहली बार टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ। 2009 में पुणे स्थित नेशनल वायरोलॉजी लैब की एक इकाई गोरखपुर में स्थापित हुई, ताकि रोग की वजहों की सही पहचान की जा सके। टेस्ट किट उपलब्ध होने के चलते दिमागी बुखार की पहचान अब मुश्किल नहीं रही, लेकिन इन एंटेरो वायरस की प्रकृति और प्रभाव की पहचान करने की टेस्ट किट अभी विकसित नहीं हो सकी है।

बचाव
बीमारी से बचने के लिए मच्छरों और कीड़े मकोड़ों से बचाव के लिए कीटनाशक का छिड़काव करें। पानी जमा न होने दें। यह बीमारी बच्चों और बूढ़ों को जल्द अपनी चपेट में लेता है। इसलिए उन्हें पूरी बांह के कपड़े पहनाने चाहिए। सोते समय मच्छरदानी जरूर लगाएं। बच्चों में वायरस के कारण होने वाली इन्सेफेलाइटिस से बचाव के लिए वैक्सीन लगवाएं।

किन राज्यों पर असर
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली जैसे इलाकों में छोटे छोटे बच्चों में ‘जापानी इंसेफेलाइटिस’ के रूप में यह पिछले दो दशकों से अधिक समय से दहशत का प्रतीत बन गया है। यह बीमारी ओडिशा और असम में भी विकराल रूप धारण कर चुकी है। पिछले साल ओडिशा में इस बीमारी से 50 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इसके अलावा 2014 में असम में इस बीमारी से 272 लोगों की मौत हुई थी।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s