देश में गाय पर सियासत, लेकिन बदहाल हैं दिल्ली की गौशालाएं

 

केंद्र सरकार की अवैध बूचड़खानों और गायों की अवैध तस्करी पर सख्ती के बाद सबसे बड़ा सवाल ये है कि बचाई गई गायों की देखभाल की जिम्मेदारी अब किसकी बनती है. क्योंकि दिल्ली के सरकारी गोसदन पहले से ही अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं. सरकार की तरफ से मिलने वाली मदद की बांट जोहते इन गोसदनों में ना तो गायों को रखने के लिए जगह है ना ही खिलाने के पैसे.

 

दिल्ली के सरकारी गोसदनों की बदहाल स्थिति किसी से छुपी नहीं है. पहले से ही संख्या से अधिक गोवंशों की देखरेख करते इन गोसदनों मे गायों की मौतों की खबरें समय-समय पर सुर्खियां भी बटोरती हैं और कुछ दिनों की सहानभूति और गोसदनों के संचालकों पर कड़ी कार्यवाही की हवाई बातों के बीच यहां ज्यादा कुछ नहीं बदलता. अब जब केंद्र सरकार ने गायों की अवैध तस्करी और अवैध बूचड़खानों पर रोक लगा दी है तो सबसे बड़ा सवाल ये है कि मौजूदा हालात में ये गोसदन अतिरिक्त गायों का बोझ कैसे उठाएंगे.

जानिए क्यों परेशान हैं दिल्ली के सरकारी गोसदन

-दिल्ली में पांच सरकारी गोसदन हैं

– यहां लाई गई प्रति गायों पर हर दिन के हिसाब से दिल्ली सरकार और एमसीडी की तरफ से केवल 40 रुपए दिए जाते हैं

– इन 40 रुपए में गोवंश की देखरेख, रहने का इंतजाम, खानपान, दावा और डॉक्टरी खर्च, और वहां काम कर रहे कर्मचारियों की तनख्वाह शामिल होती है

– उस पर भी मिलने वाली इस छोटी सी सरकारी मदद का कोई समय नहीं होता. कभी-कभी देर से दो साल में एक बार पेमेंट की जाती है वो भी किश्तों में. इससे अंदाज लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि सरकारी गोसदन आखिर इतने बुरे हालात में क्यों है.

ना ही गायों को रखने के लिए माकूल इंतजाम है और न ही खिलाने के लिए ढंग का भोजन. पहले से ही अपनी बदहाली पर आंसू बहाते इन गोसदनों पर अब और अतिरिक्त गायों का बोझ डाला जा रहा है. ऐसे में इनकी देखरेख करते लोगों का मानना है कि ज्यादा गोवंश यहां रखवाने से पहले सरकार बकाया राशि को तुरंत बहाल करें और समय पर इनको पेमेंट की जाए, उसके बाद क्षमता से अधिक गौवंश रखने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में सहायता करे जिससे पशुओं के साथ-साथ इनकी देखरेख करने वाले लोगों पर भी अतिरिक्त भार न पड़े.

डाबर हरे कृष्णा गोशाला (सुरहेरा गांव)
दिल्ली के सुरहेरा गांव स्थित इस गोशाला में मौजूद इन्फ्रास्ट्रक्टर और मिलने वाले फंड के हिसाब से यहां 1600 गोवंश रखने की क्षमता है. यहां पहले से ही 1700 गोवंश रखे गए हैं और पूरे डेढ़ साल से दिल्ली सरकार और एमसीडी का पैसा बकाया है. ऐसे में हर रोज 5 से 10 की संख्या में लाई गई गायों की देखरेख करने इनके लिए मुश्किल हो रहा है. ऐसा नहीं है कि यहां जगह की कमी नहीं है. ये अपनी जेब से पैसे लगा कर यहां और गोवंश रखने का इंतेजाम कर रहे हैं पर उनको खिलाने के पैसे कहां से आएंगे ये बड़ा सवाल है.

आचार्य सुशील गोसदन (घुम्मनहेरा गांव)
पिछले साल यहां 170 से ज्यादा गायों की मरने की खबर ने सभी को चौंका दिया था और सबसे चौंकाने वाली बात ये कि दिल्ली सरकार और एमसीडी की तरफ से इस पर ना तो कोई ठोस कार्यवाही की गई और ना ही गोवंश की सही देखरेख के लिए जरूरी पहल की गई. ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि पहले से बदहाल पड़े इन गोसदनों पर अतिरिक्त गायों के बोझ से होने वाली मौतों का जिम्मेदार कौन होगा? यहां भी जगह की कमी नहीं है. घुम्मन हेरा का ये गोसदन 19 एकड़ में बना है. यहां गायों को रखने के लिए व्यवस्थाओं का अभाव है. इसको चलाने वाले श्याम सुंदर बताते हैं कि जो भी खर्च हो रहा है उनको अपनी जेब से देना पड़ रहा है. सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही.

 

श्री कृष्णा गोशाला (बवाना)
ये दिल्ली-एनसीआर की सबसे बड़ी सरकारी गोशाला है. यहां 5300 के करीब गौवंशों की देखरेख पूरे श्रद्धा भाव से की जाती है. यहां के पशुपालक गौतम बताते हैं, “यहां हुए निर्माण जिसमें रहने की जगह और अस्पताल यहां के ट्रस्ट के मेंबर्स के चलते हैं. इतने बड़े स्केल पर हम गोवंश की देखभाल करते हैं पर सरकारी मदद ना के बराबर है और वो भी टुकड़ो में. इससे ज्यादा गायों को रखने के लिए हमें नियमित सरकारी सहयोग चाहिए.”

 

एक तरफ केंद्र सरकार गोरक्षा के लिए सख्त कानून बनाने की पहल कर रही है वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के सरकारी गोसदनो में गोसेवा के लिए एमसीडी की तरफ से मिलने वाली राशि डेढ़-दो साल में एक बार मिलती है वो भी तब जब दिल्ली एमसीडी की सत्ता पर बीजेपी काबिज है. हालांकि दिल्ली सरकार की तरफ से भी अनियमित अनुदान से गोसदनों की हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.

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