MOVIE REVIEW TUBELIGHT: दो भाईयों के प्यार की कहानी, जानें कैसी है फिल्म

 

बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ रिलीज हो गई है। फिल्म ईद के मौके पर रिलीज की गई। कबीर खान और सलमान की जोड़ी तीसरी बार नजर आई है। इससे पहले कबीर खान की ‘एक था टाइगर’ और ‘बजरंगी भाईजान’ में सलमान काम कर चुके हैं। कहते हैं बॉलीवुड में सलमान की दूसरी पारी का धांसू आगाज 2009 में वॉन्टेड के साथ हुआ था लेकिन 2012 में कबीर खान की ‘एक था टाइगर’ के साथ सलमान ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसे रिकॉर्ड्स बनाए जिसने सबको चौंका डाला।

फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ इनकी जोड़ी की तीसरी फिल्म है और अगर तीनों में सबसे कमजोर कही जाए तो गलत नहीं होगा। फिल्म में दो भाइयों लक्ष्मण (सलमान) और भरत (सोहैल खान) का प्यार दिखाया गया है। लक्ष्मण और बजरंगी भाईजान के ‘पवन’ में आपको कुछ सिमलैरिटी नजर आ सकती है। लेकिन लक्ष्मण इस फिल्म में पवन से कुछ कदम आगे निकलता नजर आया है। लक्ष्मण एक ऐसा कैरेक्टर है, जो दो देशों के बीच की लड़ाई को रोक सकता है। इस फिल्म में भारत और चीन के बीच लड़ाई दिखाई गई है।

ट्यूबलाइट’ दो भाइयों के आपसी प्यार और मनुष्य के विश्वास का गुणगान तो करती ही है, युद्ध की पृष्ठभूमि में अमन की बात भी करती है। यह फिल्म युद्ध के मनुष्य पर होने वाले प्रभावों के बारे में बात करती है। हालांकि युद्ध की विभीषिका का बताने के लिए संवादों का सहारा नहीं लिया गया है, बल्कि उसे परिस्थितियों और भावों के जरिये दिखाने की कोशिश की गई है। साथ ही यह भी बताने की कोशिश की गई है कि चेहरे का आकार-प्रकार और रूप-रंग से देश के प्रति उसकी निष्ठा और प्रेम का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए।

कबीर खान की तीसरी फिल्म
फिल्म के निर्देशक और लेखक कबीर खान की यह ‘एक था टाइगर’ और ‘बजरंगी भाईजान’ के बाद सलमान खान के साथ तीसरी फिल्म है। जब दोनों साथ आते हैं तो दोनों बेहतर नजर आते हैं। कबीर एक निर्देशक के रूप में और सलमान एक अभिनेता के रूप में। ‘ट्यूबलाइट’ इस सिलसिले को आगे बढ़ाती है। बॉक्स ऑफिस पर कारोबार की दृष्टि से भी दोनों का गठजोड़ काफी सफल रहा है। सवा दो घंटे की यह फिल्म गति में धीमी है। कई बार तो नीरस-सी होने लगती है, लेकिन तुरंत संभल जाती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका भावनात्मक होना है। कई दृश्यों में यह सहज तरीके से हंसाती भी है। अगर एक्शन की बात करें तो इसमें बिल्कुल नहीं है। युद्ध के दो-चार छोटे-छोटे दृश्यों को छोड़ कर। इस मामले में यह सूरज बड़जात्या के फिल्मों की तरह है।

सिनमेटोग्राफी है शानदार
फिल्म की सिनमेटोग्राफी बहुत सुंदर है। असीम मिश्रा ने प्राकृतिक दृश्यों को बहुत खूबसूरती से उनके वास्तविक स्वरूप में अपने कैमरे में कैद किया है। फिल्म का संगीत भी ठीक है। प्रीतम की धुनें सुनने लायक हैं। खासकर ‘सजन रेडियो’ बहुत मधुर और मस्ती भरा है। इसका पिक्चराइजेशन भी बहुत सुंदर है। वैसे प्रीतम के संगीत से ज्यादा असरदार जूलियस पकियम का बैकग्राउंड म्यूजिक है।

दो भाइयों की केमेस्ट्री
भाइयों के रूप में सोहेल खान और सलमान खान की केमिस्ट्री शानदार है। दोनों का एक-दूसरे के प्रति प्यार यह एहसास कराता है कि दोनों वास्तव में भी भाई हैं। सोहेल का अभिनय ठीक रहा है। ओमपुरी तो साधारण से साधारण किरदार को भी असाधारण बना देते हैं। जीशान अय्यूब के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। बन्ने चाचा की सहयोगी माया के रूप में ईशा तलवार अच्छी लगी हैं। उनका अपीयरेंस निमरत कौर से काफी मिलता है। बृजेंद्र काला अपने अभिनय के अलग अंदाज से छोटी-छोटी भूमिकाओं को भी असरदार बना देते हैं।

चीनी अभिनेत्री जू जू का कमाल
लिलिंग के रूप में चीनी अभिनेत्री जू जू प्रभावित करती हैं। उनके एक्सप्रेशन अच्छे लगे हैं। गुओ के रूप में माटिन की मासूमियत प्रभावित करती है। फिल्म के सभी कलाकारों का अभिनय अच्छा है, लेकिन ये फिल्म पूरी तरह से सलमान खान की है। उन्होंने एक मंदबुद्धि नौजवान के रूप में बेहतरीन अभिनय किया है। वह अपने अभिनय से बार-बार भावुक करते हैं। यह उनका अब तक का सबसे अच्छा अभिनय है। वह यह यकीन दिलाने में कामयाब रहते हैं कि अगर वह अच्छा अभिनय करना चाहें तो निस्संदेह कर सकते हैं।

क्यों देखें फिल्म?
फिल्म के समग्र प्रभाव की बात करें तो यह प्रभावित करती है। फिल्म के जरिये निर्देशक जो कहना चाहते हैं, वह कहने में काफी हद तक सफल रहे हैं। यह फिल्म देखने लायक है। खासकर जो लोग भावनात्मक कहानियां पसंद करते हैं, उनके लिए इसमें बहुत कुछ है।

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