दिल्ली में खिसक गई केजरीवाल की जमीन? केजरीवाल के सामने हैं ये 5 मुश्किलें

 

आम आदमी पार्टी को एमसीडी चुनाव से खासी उम्मीदें थीं. लेकिन दिल्ली की जनता के फैसले ने इनपर पानी फेर दिया है. अपने ही गढ़ में मिली मात के बाद अब अरविंद केजरीवाल के लिए सियासी राह और कठिन हो गई है. आपको बताते हैं ये नतीजे कैसे बढ़ाएंगे केजरीवाल की मुश्कलें.

धरा रह जाएगा बाकी राज्यों का सपना?
भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से सियासी पार्टी में तब्दील होने के वक्त ही अरविंद केजरीवाल और उनके सिपहसालारों ने साफ किया था कि वो शुरुआत भले ही दिल्ली से कर रहे हैं लेकिन हर राज्य में जनता को कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प देंगे. 2015 के चुनाव में जीत के बाद इसी मसले पर पार्टी में फूट भी पड़ी. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेताओं की राय थी कि आम आदमी पार्टी को बाकी राज्यों में विस्तार की महत्वाकांक्षा फिलहाल छोड़ देनी चाहिए और पूरा ध्यान दिल्ली में किए गए वायदों को पूरा करने पर लगाना चाहिए. यही मतभेद आखिर में पार्टी से उनकी छुट्टी की वजह बने थे. इसके बाद आम आदमी पार्टी ने महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और गोवा समेत कई राज्यों में सियासी जमीन तलाशने की कोशिश की है. लेकिन एमसीडी चुनाव में नतीजों के बाद बाकी राज्यों में पार्टी के ग्राफ पर असर पड़ना तय है. लोग पूछ सकते हैं कि जब दिल्ली की जनता ने स्थानीय मुद्दों पर ही केजरीवाल पर यकीन नहीं किया तो बाकी राज्यों के लोग पार्टी की नीतियों पर भला क्यों मुहर लगाएं? एमसीडी चुनाव के नतीजों के बाद पार्टी के रणनीतिकारों को इस सवाल का जवाब खोजना होगा.

विपक्ष का चेहरा कैसे बनेंगे केजरीवाल?
तमाम सियासी पंडित इस बात पर सहमत हैं कि देश की राजनीति में फिलहाल मजबूत विपक्ष की कमी है. राहुल गांधी खुद को मजबूत नेता के तौर पर स्थापित करने में नाकाम रहे हैं और बाकी पार्टियां अपने-अपने असर वाले राज्यों से बाहर कोई खास करिश्मा नहीं कर पाई हैं. ऐसे में बीजेपी को चुनौती देने के लिए विपक्षी पार्टियों को एक ऐसे चेहरे की तलाश है जिसे मोदी के खिलाफ जनता के सामने पेश किया जा सके. बिहार के सीएम नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद को इसी कतार के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है. केजरीवाल के समर्थक भी उनकी ब्रांडिंग मोदी के विकल्प के तौर पर करते रहे हैं. यही वजह है कि केजरीवाल ने पिछले लोकसभा चुनाव में वाराणसी जाकर मोदी को सीधी टक्कर दी थी. आए दिन वो मोदी को उनकी नीतियों और फैसलों पर सीधी चुनौती देते रहे हैं. लेकिन अपने ही गढ़ में मिली इस करारी हार के बाद ये साफ है कि केजरीवाल दिल्ली में ही अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए जूझ रहे हैं. ऐसे में पूरे देश में मोदी के विकल्प के तौर पर जनता उन्हें देखेगी, इसपर गहरा शक है.

दिल्ली में बदलनी होगी रणनीति?
आम आदमी पार्टी जब सामाजिक आंदोलन थी तो उसे मध्यम वर्ग ने हाथों हाथ लिया था. लेकिन दिल्ली की सियासी जमीन में पार्टी ने निचले तबके के लोगों को लुभाने पर जोर दिया. चाहे ऑटोवाले हों या फिर झुग्गियों में रहने वाले लोग, पार्टी के एजेंडे में उनके सरोकार सबसे ऊपर होने का दावा किया गया. आम आदमी पार्टी को उम्मीद थी सस्ती बिजली, सस्ते पानी और मोहल्ला क्लिनिक जैसी योजनाओं से इन तबकों के बीच उसका जनाधार मजबूत होगा. एमसीडी चुनाव के बाद अब पार्टी को सोचना होगा कि वो ऐसी कौन सी नीतियां अपनाए जिससे ना सिर्फ लोअर मिडल क्लास और गरीब वर्ग के वोटर उसके पास बने रहें, बल्कि अपर मिडल क्लास, खासकर युवा भी पार्टी पर दोबारा विश्वास कर सकें. एमसीडी चुनाव के साथ कांग्रेस ने भी साबित किया है कि वो दिल्ली में अभी लुप्त नहीं हुई है. लिहाजा आम आदमी पार्टी देश की राजधानी में अपना राज बचाए रखने के लिए ना सिर्फ बीजेपी की चुनौती से निपटना है बल्कि कांग्रेस के कमबैक को लेकर भी नई रणनीति बनानी है.

नेतृत्व पर उठेंगे सवाल?
अपने जन्म के बाद से ही आम आदमी पार्टी असंतुष्टों का सामना करती रही है. पार्टी से बाहर जाने वाले नेताओं का सिलसिला शायद ही कभी थमा है. इस हार के बाद पार्टी के भीतर दरारें और गहरी हो सकती हैं. कई और नेता हवा का रुख भांपते हुए बीजेपी या कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं. अब तक केजरीवाल निर्विवादित तौर पर आम आदमी पार्टी के नंबर-1 नेता रहे हैं. ये मुमकिन है कि इस हार के बाद पार्टी के भीतर केजरीवाल के नेतृत्व और काम करने के तरीकों पर कुमार विश्वास जैसे नेता सवाल उठाएं. पार्टी के नेता भगवंत मान नतीजे आने के बाद पार्टी पर सवाल उठा भी चुके हैं.

केंद्र सरकार के साथ बढ़ेगा टकराव?
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का अब तक का कार्यकाल केंद्र सरकार और एलजी के दफ्तर के साथ उनके टकराव की वजह से सुर्खियों मे आता रहा है. मोदी सरकार ने भी आम आदमी पार्टी की सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं गंवाया है. एमसीडी चुनावों में हार के बाद बीजेपी और ज्यादा आक्रामक सुर में ये दावा कर सकेगी कि दिल्ली की जनता अब केजरीवाल के साथ नहीं, बल्कि मोदी के साथ है. लिहाजा केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच कशीदगी बढ़ने के आसार हैं

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