उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा साईकिल स्टैंड के टैंडर को लेकर धांधली का संदेह

नार्थ एमसीडी का साईकिल स्टैंड प्रोजक्ट ट्रैफिक समस्या का समाधान या किसी एक कंपनी को दिया गया फायदे का वरदान
 नार्थ एमसीडी ने अपने कुछ इलाको में साईकिल स्टेण्ड बनाने का निर्णय लिया है। इन स्टैंडों पर साइकिलो को खड़ा किया जायेगा जिसका इस्तेमाल लोग कर सकेंगे।दिल्ली मेट्रो रेल निगम की तर्ज़ पर नार्थ एमसीडी भी साईकिल स्टेंडो का निर्माण अपने इलाको में करवाएगी। नार्थ एमसीडी की स्थाई समिति के अध्यक्ष प्रवेश वाही के अनुसार विभिन्न इलाको में करीब 25 साईकिल  स्टैंड लगाए जायेंगे जिनका क्षेत्रफल करीब 25 फ़ीट  गुना 8 फ़ीट होगा।
 कंपनी अपनी लागत से साईकिल स्टैंड बनाएगी और वहां दस-दस साइकिलें  खड़ी  करेगी। इस बाबत कंपनी से 10 साल का करार किया जायेगा और उससे हर माह करीब 16 हज़ार रुपए वसूल किये जायेंगे। अपनी आय बढ़ाने के लिए कंपनी को यह अधिकार भी दिया जायेगा की वह साईकिल स्टैंड पर 20 फ़ीट गुणा 8 फ़ीट का विज्ञापन भी लगा सके।
 नार्थ एमसीडी का यह प्रोजक्ट आने से पहले ही विवादों में घिरता नज़र आ रहा है। टैंडर की प्रिवीड मीटिंग में सभी कॉन्ट्रेक्टर इसका विरोध करते नज़र आये उन्होंने इसे आनन्-फानन और दबाब में लिया गया फैसला बताया। नाम न छापने की शर्त पर कांट्रेक्टरो ने बताया की इस टैंडर के लिए जिन नियमो और शर्तो को रखा गया है वह किसी भी कंपनी के लिए पूरा कर पाना असंभव है सिवाए एक कंपनी के। कंपनी का नाम न बताते हुए उन्होंने कहा की नियम व् शर्तो को केवल उसी कंपनी के लिए बनाया गया है और एक कंपनी को फायदा पहुचाने के लिए इस तरह का प्रोजक्ट लॉन्च किया जा रहा है। यह फैसला एक कंपनी को फायदा पहुचाने के लिए दबाब में लिया गया फैसला है।
जानकारों की माने तो इस साईकिल स्टैंड के निर्माण से नार्थ एमसीडी को अपेक्षित आय से 8 से 10 गुणा नुक्सान होना निश्चित है। टैंडर के करार की निगम द्वारा रखी गई अवधि में निगम को करीब 42 करोड़ रुपए से अधिक  का नुकसानआने वाले समय में हो सकता है। निगम के अनुसार इस स्टैंड के निर्माण से निगम पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा परंतु जानकार कहते है की निगम ने जो रेट कंपनी के लिए तय किया है वह बहुत कम है। इससे केवल टेंडर लेने वाली कंपनी को फायदा पहुचाया जा रहा है। साईकिल स्टैंड की आड़ में निगम द्वारा टैंडर को लेकर धांधली करने का संदेह हो रहा है।
निगम पहले ही घाटे में चल रही है आये दिन निगम के कर्मचारी अपनी सैलरी को लेकर प्रदर्शन कर रहे है। निगम उन्हें सेलरी देने में असमर्थ दिख रहा है उसके वावुजूद निगम इस तरह के फैसले कैसे ले सकता है जिससे निगम को और अधिक घाटा होने की आशंका हो।
जानकारों का कहना है की निगम का यह फैसला आनन्-फानन में लिया गया फैसला है। निगम जिन क्षेत्रो में यह स्टैंड  बना रहा है वहां साईकिल ट्रेक तक की व्यवस्था नहीं है। साथ ही यह सभी इलाके भारी ट्रैफिक वाले है इन इलाको में यदि बिना साईकिल ट्रैक के साइकिल चलाई जाएगी तो मानव जीवन को खतरा हो सकता है। भारी ट्रैफिक के कारण यहाँ दुर्घटना होने के आसार बढ़ जाते है। निगम मानव जीवन की सुरक्षा के विषय में न सोच कर किस तरह इस तरह के फैसले ले सकता है। साईकिल प्रदुषण को कम तो करता है लेकिन बिना माकूल व्यवस्था (साईकिल ट्रेक)के यह दुर्घटनाओं को भी आमंत्रण देता है।
यह सोचने का विषय है की क्या निगम में आलाधिकारियों और नेतागणों की मिलीभगत से किसी एक कंपनी को फायदा पहुचाने के लिए निगम इस तरह के प्रोजक्ट को लांच करने में जुटा है। और उसे वह प्रदुषण और ट्रेफिक से निज़ात पाने के प्रोजक्ट के रूप में पेश कर रहा है। परदे के पीछे क्या डील है यह कहना मुश्किल है लेकिन इससे निगम को भविष्य में भारी नुकसान होने की आशंका है।
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